शुरुआती प्रतिक्रिया से यह साफ है कि भाजपा ने न सिर्फ यह अपील ठुकरा दी है, बल्कि इसके बहाने प्रधानमंत्री पर निशाना भी साध लिया है। पार्टी प्रवक्ता राजीव प्रताप रूडी ने आरोप लगाया है कि यह अपील कर प्रधानमंत्री भी एक तरह से उन लोगों के साथ खड़े हो गए हैं, जो भारत विरोधी भावनाएं जताते हुए राष्ट्रीय झंडा फहराने का विरोध कर रहे हैं। मगर बेहतर होता कि भाजपा तुरंत ऐसी प्रतिक्रिया जताने के बजाय प्रधानमंत्री की भावना पर ध्यान देती। भाजपा का यह सवाल वाजिब है कि देश के किसी हिस्से में तिरंगा फहराने को कोई अपने लिए चुनौती कैसे मान सकता है?
उसकी इस बात में भी दम है कि सिर्फ राष्ट्र के दुश्मन ही इससे उत्तेजित हो सकते हैं। लेकिन यहां बात कश्मीर के ताजा संदर्भ की है। केंद्र में छह साल तक सत्ता में रही इस पार्टी को इस बात का अहसास होगा कि भारी अशांति के बाद कश्मीर घाटी में हालात कुछ संभलते दिख रहे हैं। इस बीच कश्मीर के कुछ नरमपंथी नेताओं ने अलगाववादियों की हिंसा और नापाक इरादों के खिलाफ बोलने का साहस भी दिखाया है।
ऐसे मौके पर कोई ऐसा काम सही नहीं माना जा सकता, जिससे चरमपंथियों को एक बार फिर घाटी में सिर उठाने का मौका मिले। भाजपा के पास तिरंगा फहराने के लिए बाकी पूरा देश है। फिलहाल, मुख्य विपक्षी दल से देश की अपेक्षा यही है कि वह हालात को संभालने की चुनौती को और गंभीर ना बनाए।
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