स्विट्जरलैंड और लिचटेंस्टाइन जैसे देशों में जमा भारतीयों का कालाधन देश में बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन गया है। दावा किया जा रहा है कि पिछले कई दशकों में देश के करीब 71 लाख करोड़ रुपये इन देशों के बैंकों में जमा हैं। यह राशि भारत के कुल जीडीपी से कहीं ज़्यादा है। अगर भारत इस राशि का 25 फीसदी भी हासिल करने में कामयाब हो जाता है तो देश में बुनियादी ढांचे की जरूरत पूरी हो जाएगी और देश विकास के रास्ते पर तेजी से दौड़ने लगेगा।
सरकार का तर्क और विशेषज्ञों की काट
सरकार गोपनीयता और स्विटजरलैंड के कानूनों का हवाला देकर असमर्थता जताती रही है। वह समझौतों की बंदिश का हवाला देकर खाताधारकों के नाम बताने से भी इनकार रही है। वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने कहा कि डबल टैक्सेशन अवॉएडेंस ट्रिटी के चलते हम खाताधारकों के नाम सार्वजनिक नहीं कर सकते। इससे पहले प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह भी इसी समझौते के हवाले से यह कहते रहे हैं कि काला धन जमा करने वाले भारतीयों के नाम सार्वजनिक नहीं किए जा सकते हैं, क्योंकि ऐसा करने से अंतरराष्ट्रीय समुदाय में भारत की छवि खराब होगी और देश अलग-थलग पड़ जाएगा। हालांकि सरकार इसके साथ यह भी कहती रही है कि स्विस बैंकों में जमा काले धन को देश में लाने की कोशिश की जाएगी। लेकिन ज़्यादातर लोग यह मानते हैं कि इस मुद्दे पर सरकार का रुख ढीलाढाला है नहीं तो काले धन की वापसी का रास्ता बहुत मुश्किल नहीं है। सरकार का स्विस बैंक खातों की गोपनियता का तर्क भी पूरी तरह से सही नहीं है। स्विस बैंकिंग एसोसिएशन और वहां के जानकारों का कहना है कि बैंक खातों की गोपनियता अंतिम नहीं है। उनके मुताबिक इसकी भी सीमाएं हैं। अपराध, आतंकवाद और कर घपले जैसे मामलों में इस्तेमाल और कमाए गए पैसे की जानकारी स्विस सरकार दे सकती है।
कैसे वापस आ सकता है काला धन
सरकार को देश के कई कर विशेषज्ञ काला धन वापस लाने के लिए सलाह देने को तैयार हैं। ऐसे तमाम कदम हैं जिनसे भारत का काला धन देश में वापस आ सकता है।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहल
तेजी से आर्थिक तरक्की कर रहे दुनिया के 20 विकसित और विकासशील देशों के संगठन जी-20 का भारत सदस्य है। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत काले धन का मुद्दा जी-20 के मंच पर रख सकता है। भारत अपनी बढ़ती आर्थिक हैसियत और अमेरिका वगैरह के सहयोग से स्विट्जरलैंड जैसे देशों पर राजनयिक दबाव बना सकता है। जानकार यह भी कहते हैं कि भारत इस मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय मॉनेटरी फंड (आईएमएफ) में भी रख सकता है। भारतीय प्रबंधन संस्थान (आईआईएम), बेंगलुरु के प्रोफेसर आर. वैद्यनाथन के मुताबिक आप विभिन्न अंतरराष्ट्रीय मंचों पर यह मामला रख सकते हैं और अपनी आर्थिक और राजनयिक रसूख का इस्तेमाल कर अंतरराष्ट्रीय बिरादरी के सामने मसले को रख सकते हैं।
टैक्स से जुड़े कानून में बदलाव भी एक रास्ता
भारत इनकम टैक्स के पूर्व चीफ कमिश्नर केवीएम पाई की ओर से सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिका में कहा है कि आम माफी के जरिए भी काले धन को देश में वापस लाया जा सकता है। इसके तहत देश के कर कानूनों में संशोधन करके 30 फीसदी कर और ब्याज की रकम वसूल कर काला धन जमा करने वालों को माफ किया जा सकता है। २००९ के लोकसभा चुनाव से पहले पाई ने इस बाबत एक चिट्ठी केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (सीबीडीटी) और प्रधानमंत्री कार्यालय को लिखा था। याचिका में पाई ने काले धन को देश में लाने और इसके देश से बाहर जाने पर रोक लगाने के लिए कई उपाय सुझाए हैं। पाई की पेशकश की खास बात यह है कि इसमें कहा गया है कि इनकम टैक्स रिटर्न भरते समय करदाताओं के लिए यह जरूरी किया जाए कि वे विदेशी खातों में जमा रकम का ब्योरा दें। गौरतलब है कि भारत के सीबीडीटी के तर्ज पर अमेरिका की इंटरनल रेवेन्यू सर्विस ने अमेरिका के कर देने वाले सभी नागरिकों के लिए यह जरूरी कर दिया है कि वे विदेश में चल रहे बैंक खातों की जानकारी दें।
मुकदमा और कानूनी कार्रवाई भी एक जरिया
कई कर विशेषज्ञों का कहना है कि भारत से बाहर काला धन ले जाने वाले ज्यादातर लोग सिर्फ टैक्स चोरी के आरोपी नहीं हैं। इनमें से ज़्यादातर ने मनी लॉन्डरिंग और हवाला जैसे आर्थिक अपराध किए हैं। भारत ऐसे लोगों के खिलाफ मुकदमा दायर कर स्विस सरकार के सामने पेश कर सकता है। स्विस कानूनों के मुताबिक अगर वहां के बैंकों में जमा धन किसी आतंकवादी या आपराधिक गतिविधि के जरिए कमाया गया है या फिर उसके ऐसे इस्तेमाल की गुंजाइश है तो वहां की सरकार भारत की मदद कर सकती है। कर विशेषज्ञ और आयकर अधिकारी रहे विश्वबंधु गुप्ता का कहना है कि भारत विदेशों में काला धन जमा करने वाले लोगों का मामला इंटरपोल के हवाले करे और उन्हें सबूत मुहैया कराए। उनके मुताबिक इंटरपोल इस मामले को देख सकती है।
स्वैच्छिक आय घोषणा योजना का विकल्प
1997 के स्वैच्छिक घोषणा योजना (वीडीआईएस-97) की तर्ज पर एक योजना की घोषणा का भी सुझाव सरकार के सामने है। गौरतलब है कि वीडीआईएस-97 के जरिए देश को 10,500 करोड़ रुपये अतिरिक्त कर मिला था। कई कंपनियों के बोर्ड ऑफ डाइरेक्टर में शामिल, एनसीपी के कोटे से राज्यसभा सदस्य और वरिष्ठ कर अधिवक्ता वाईपी त्रिवेदी ने सरकार के सामने यह सुझाव रखा है। त्रिवेदी के इस प्रस्ताव के मुताबिक सरकार टैक्स रिलीफ बॉन्ड खरीद सकता है। इसके जरिए वह फेमा के तहत प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष कर कानूनों के तहत माफी का फायदा उठा सकता है। उन्होंने इस उपाय के तहत दूसरे केंद्रीय और राज्य स्तरीय टैक्सों में भी छूट दिए जाने की वकालत की है। इसके अलावा उन्होंने बॉन्ड पर ब्याज लगाने की बात भी कही है। उनके प्रस्ताव के मुताबिक पांच साल के बॉन्ड पर 4 फीसदी, 10 साल पर 5 फीसदी, 15 साल पर 6 फीसदी और 20 साल के बॉन्ड पर 7 फीसदी ब्याज वसूलने का प्रस्ताव सरकार को भेजा है। उनके मुताबिक इस योजना में सभी भारतीय, प्रवासी भारतीय और भारतीय मूल के विदेशी नागरिक शामिल होंगे। इस योजना की अवधि छह महीने रखी जाए। साथ ही आयकर विभाग यह तय करे कि वह ऐसे बॉन्ड खरीदने वाले से आय का स्रोत न पूछे। जानकारों का मानना है कि ऐसी योजना से भी देश से काला धन बाहर ले जाने वाले लोग उस पैसे को देश में वापस लाएंगे और इसके लिए भारत को किसी दूसरे देश से मदद की जरूरत भी नहीं पडे़गी। हालांकि, इससे ७१ लाख करोड़ रुपये की कुल रकम काली कमाई का कुछ हिस्सा ही भारत के सरकारी खजाने में जाएगा।
क्या स्विस सरकार सहयोग करेगी?
आईआईएम के प्रोफेसर आर. वैद्यनाथन मानते हैं कि भारत का नहीं बल्कि अमेरिका का दबाव स्विट्जरलैंड को सहयोग करने पर मजबूर कर देगा। कई जानकारों का मानना है कि यूरोपियन यूनियन समेत कई अंतरराष्ट्रीय संगठनों और समूहों के बीच भारत की बढ़ती साख भारत के कानूनी रूप से जायज मांग को पुख्ता करती है। ऐसे में जानकार मानते हैं कि स्विट्जरलैंड सरकार इस मामले में भारत को सहयोग दे सकती है। स्विट्जरलैंड के बैंकिंग कानूनों के कई जानकारों का मानना है कि ऐसे मामलों में स्विस सरकार भारत की मदद कर सकती है। लेकिन इसके लिए भारत को औपचारिक निवेदन करना होगा। स्विट्जरलैंड बैंकिंग एसोसिएशन (एसबीए) का साफ तौर पर कहना है कि अगर भारत सभी केसों में मौजूद सबूत और कानून तोड़ने का ब्योरा स्विस सरकार को सौंपे तो वहां की सरकार भारत की मदद करेगी। लेकिन इसके लिए भारत को पूरा होम वर्क करना होगा। एसबीए के जनसंपर्क प्रमुख नेसन ने एक निजी भारतीय समाचार चैनल से बातचीत में कहा है कि स्विस सरकार जल्द ही एक ऐसा संशोधन करने जा रही है, जिसके बाद टैक्स चोरी जैसे मामलों में भी स्विस सरकार ब्योरा देगी। भारत और स्विट्जरलैंड ने अगस्त, २०१० में डबल टैक्सेशन अवॉएडेंस अग्रीमेंट में संशोधन के लिए एक समझौता किया था। इस समझौते के बाद उम्मीद जताई गई थी कि इससे भारत काले धन की जानकारी आसानी से हासिल कर सकता है और इस पैसे को वापस लाया जा सकता है।
अमेरिका ने हासिल किए थे 4,000 खातों की जानकारी
स्विट्जरलैंड के बैंक यूबीएस ने 2009 में 4,000 अमेरिकी खातों की जानकारी अमेरिकी सरकार को टैक्स चोरी के आरोपों की जांच के लिए दी थी। अमेरिका ऐसे 52,000 ग्राहकों के खातों का ब्योरा जानना चाहता है। 19 फरवरी, 2009 को स्विस बैंक यूबीएस ने 78 करोड़ अमेरिकी डॉलर का काला धन अमेरिका को सौंपने के अलावा करीब 20 अरब डॉलर की संपत्ति का भी ब्योरा अमेरिका को दिया था। अमेरिका की इंटरनल रेवेन्यू सर्विस ने काले धन को देश में लाने के लिए जो कानून बनाया उसके मुताबिक अमेरिकी लोगों को विदेशी बैंकों में किसी एक खाते में जमा अधिकतम रकम का 20 फीसदी, छह सालों में उस राशि पर लगने वाला कर और ब्याज चुकाना होता है। अमेरिकी कानूनों के मुताबिक अगर अमेरिका का नागरिक देश से बाहर भी पैसा कमाता है तो उसे कर चुकाना होता है। अगर अमेरिकी नागरिक की आय पर दूसरा देश कर लेता है तो कानूनों के आधार पर अमेरिका उसे कर में छूट भी देता है। लेकिन भारत में सरकार सिर्फ भारत में रहने वाले लोगों से ही कर की मांग करता है।
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